झाँसी। रानी लक्ष्मीबाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, झांसी में “विकसित कृषि-विकसित भारत @2047” विषय पर आयोजित अखिल भारतीय किसान मेला एवं कृषि प्रदर्शनी–2026 का भव्य शुभारंभ प्रदेश के कृषि, कृषि शिक्षा एवं कृषि अनुसंधान मंत्री सूर्य प्रताप शाही, प्रो. रमेश चन्द, सदस्य नीति आयोग, झाँसी-ललितपुर के सांसद अनुराग शर्मा, कुलपति डॉ. अशोक कुमार सिंह, गौ-सेवा आयोग के अध्यक्ष श्याम बिहारी गुप्ता, पंकज त्रिपाठी, निदेशक कृषि, उत्तर प्रदेश, डॉ. बीके बेहरा, मुख्य कार्यकारी अधिकारी, राष्ट्रीय मत्स्य विकास बोर्ड, तथा निदेशक प्रसार शिक्षा डॉ सुशील कुमार सिंह ने फीता काट कर किया।
उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही जी ने राष्ट्रीय महत्व की दो अत्याधुनिक प्रयोगशालाओं * “श्री अन्न उत्कृष्टता केंद्र”* एवं “जैविक और प्राकृतिक खेती उत्कृष्टता केंद्र”(कृषि उत्पाद परीक्षण प्रयोगशाला) का लोकार्पण भी किया तथा वानिकी उत्पाद कार्यशाला की आधारशिला रखी। बुंदेलखंड पैकेज, उत्तर प्रदेश सरकार एवं नीति आयोग के सहयोग से स्थापित ये प्रयोगशालाएँ अब क्षेत्र के किसानों को स्थानीय स्तर पर ही उत्पादों की वैज्ञानिक गुणवत्ता जाँच, परीक्षण एवं प्रमाणन की सुविधा प्रदान करेंगी।

कृषि मंत्री श्री सूर्य प्रताप शाही जी ने अपने ओजस्वी संबोधन में कहा कि झाँसी की यह वीरभूमि, जहाँ से रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों को झुकने पर मजबूर किया, आज विकसित भारत @2047 के संकल्प की नई चेतना जगा रही है। उन्होंने “जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान” का मंत्र देते हुए कहा कि कृषि शोध को प्रयोगशालाओं से निकालकर सीधे किसानों के खेत तक पहुँचाना ही हमारी प्राथमिकता है। उत्तर प्रदेश जनसंख्या में भी बड़ा है और खाद्यान्न उत्पादन में भी बड़ा है। देश का लगभग 30% गेहूँ उत्तर प्रदेश में पैदा होता है। उन्होंने कहा कि फसल चक्र अपनाकर, बीज शोधन कर और नई तकनीकों से खेती करने पर ही आत्मनिर्भर भारत का 2047 का संकल्प पूर्ण होगा। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के तहत बुंदेलखंड के 7 जनपदों के किसानों को प्रतिवर्ष 6000 की सहायता सीधे मिल रही है। उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश का कृषि बजट पहले से कई गुना अधिक हो गया है उन्होंने बताया कि 90,000 से अधिक सोलर पंप लगाए गए हैं। तिलहन के 8 लाख से अधिक और अन्य फसलों के 6 लाख से अधिक बीज की मिनी किट वितरित किए गए हैं। झांसी में तिलहन एवं दलहन की 20,000 मिनी किट उपलब्ध कराई हैं। तथा धान की 60 लाख मीट्रिक टन खरीद कर पूर्ण भुगतान किया गया है। मसूर और चना के एमएसपी में उल्लेखनीय वृद्धि कर किसानों को मजबूत आधार दिया गया है। श्री अन्न पुनरुद्धार योजना के अंतर्गत एक लाख किसानों को निशुल्क मिनी किट दिया हुआ है।हमारी सरकार में 40,000 हेक्टेयर जमीन पर सिंचाई सुविधा बढ़ी है खरीफ सीजन में विकसित कृषि अभियान के अंतर्गत 18000 ग्रामों में वैज्ञानिकों ने जाकर किसानों से खेती पर सीधा संवाद किया है।
उन्होंने बुंदेलखंड में निःशुल्क दलहन मिनी किट, खेत तालाब, सोलर फेंसिंग, 12 माह सिंचाई सुविधा, मिलेट पुनरुद्धार योजना, बीज उत्पादन पर प्रोत्साहन, तथा प्राकृतिक खेती और जैविक खाद को बढ़ावा देने की योजनाओं का उल्लेख किया।
कृषि विश्वविद्यालय द्वारा 200 एकड़ में विकसित मॉडल फार्म, हाई-टेक पॉलीहाउस, ग्रीष्मकालीन मक्का, चिया सीड्स, क्विनोआ के उत्पादन तथा नवाचारों की सराहना करते हुए कहा कि यह संस्थान बुंदेलखंड की तकदीर बदलने का केंद्र है। उन्होंने किसानों से संगठित खेती, पशुपालन, दुग्ध, तिलहन, दलहन, मधुमक्खी व मत्स्य पालन को एकीकृत मॉडल के रूप में अपनाने का आह्वान किया। विश्वविद्यालय में आज मैंने राष्ट्रीय महत्व की दो अत्याधुनिक प्रयोगशालाओं का उद्घाटन भी किया है इन प्रयोगशालाओं के माध्यम से न केवल जैविक और प्राकृतिक खेती को मजबूती मिलेगी, बल्कि मोटे अनाजों श्री अन्न की खेती का रकबा भी बढ़ेगा।इससे किसानों को गुणवत्तापूर्ण उत्पादन, बेहतर बाजार और अधिक आय का सीधा लाभ मिलेगा।
कार्यक्रम में उन्होंने उपस्थित किसानों सुनीता गौरी, प्रताप नारायण दुबे, रुद्र प्रताप सिंह गौर, जगतपाल मिश्रा आदि की समस्याएँ सुनकर समाधान हेतु अधिकारियों को निर्देश भी दिए। अंत में उन्होंने कहा कि वर्तमान सरकार किसानों के स्वाभिमान, समृद्धि और आत्मनिर्भर कृषि के लिए पूर्णतः प्रतिबद्ध है, और उत्तर प्रदेश इस कृषि परिवर्तन का नेतृत्व करेगा। प्रो. रमेश चंद, सदस्य, नीति आयोग* ने अपने संबोधन में कहा कि भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने में कृषि क्षेत्र की उत्पादकता, विविधीकरण और मूल्य संवर्धन की केंद्रीय भूमिका होगी। उन्होंने जोर दिया कि किसानों को केवल उत्पादन तक सीमित न रहकर प्रसंस्करण, ब्रांडिंग और बाजार से सीधा जुड़ाव स्थापित करना होगा। उन्होंने “लैब टू लैंड” की अवधारणा पर बल देते हुए कहा कि वैज्ञानिक अनुसंधान का लाभ सीधे खेत तक पहुँचना चाहिए और गुणवत्तापूर्ण बीजों में निवेश ही उच्च उत्पादकता की आधारशिला है। प्रो. चंद ने बताया कि भारत में कृषि विकास दर लगभग 4.6% है, जबकि उत्तर प्रदेश में यह 5% से अधिक है, जो देश को वैश्विक स्तर पर कृषि वृद्धि में अग्रणी बनाता है। उन्होंने कहा कि आज 56% बीमारियाँ असंतुलित एवं असुरक्षित भोजन से जुड़ी हैं, इसलिए पोषण-संवेदनशील खेती, श्री अन्न (मिलेट्स), दलहन एवं तिलहन का उत्पादन समय की मांग है। उन्होंने बढ़ते न्यूनतम समर्थन मूल्य को किसानों के हित में सकारात्मक कदम बताते हुए कहा कि गुणवत्ता परीक्षण, प्रमाणन और उत्कृष्टता केंद्रों की स्थापना से किसानों की आय वृद्धि, निर्यात संभावनाएँ और कृषि की समग्र मजबूती सुनिश्चित होगी।
सांसद अनुराग शर्मा* ने अपने प्रेरक संबोधन में कहा कि उत्तर प्रदेश में तिलहन, दलहन, दुग्ध, सब्जी एवं मोरिंगा उत्पादन के क्षेत्र में ऐतिहासिक सौगातें दी गई हैं, जिनसे बुंदेलखंड के किसान नई संभावनाओं के साथ आगे बढ़ रहे हैं। उन्होंने स्मरण कराया कि रानी लक्ष्मीबाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के उद्घाटन अवसर पर प्रधानमंत्री जी ने “जय किसान, जय जवान, जय अनुसंधान” का मंत्र दिया था, जो आज आत्मनिर्भर भारत की आधारशिला है। उन्होंने कहा कि देश की आत्मा गाँवों में बसती है और किसान केवल अन्नदाता ही नहीं, बल्कि ऊर्जा दाता भी बन सकते हैं। सरकार द्वारा गोबर गैस एवं बायो-ऊर्जा के लिए बढ़ाया गया बजट इसका प्रमाण है। उन्होंने आह्वान किया कि बुंदेलखंड के किसान विश्वविद्यालय से निरंतर जुड़कर वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाएँ, उत्पादन बढ़ाएँ और क्षेत्र को कृषि नवाचार का अग्रणी मॉडल बनाएं।
अध्यक्ष गौ सेवा आयोग उत्तर प्रदेश श्याम बिहारी गुप्ता* ने कहा कि कृषि और गौ-संवर्धन एक-दूसरे के पूरक हैं। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक खेती, जैविक खाद, गोबर गैस और पंचगव्य आधारित कृषि प्रणाली से किसानों की लागत घटेगी और भूमि की उर्वरता बढ़ेगी। श्री गुप्ता ने किसानों से आह्वान किया कि वे गौ-आधारित समेकित कृषि मॉडल अपनाकर आत्मनिर्भर बनें और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त करें। साथ ही कहा कि विश्वविद्यालय के सजीव कृषि तकनीकी प्रदर्शन, कृषि यंत्र प्रदर्शन, प्रक्षेत्र भ्रमण, पशु प्रदर्शनी तथा किसान-वैज्ञानिक गोष्ठियाँ किसानों को व्यवहारिक ज्ञान प्रदान करेंगी।
कुलपति प्रो अशोक कुमार सिंह ने कहा कि “विकसित कृषि–विकसित भारत @2047” का लक्ष्य वैज्ञानिक अनुसंधान, नवाचार और किसानों की सक्रिय भागीदारी से ही साकार होगा। उन्होंने इस किसान मेले को किसानों, उद्यमियों एवं वैज्ञानिकों का संगम बताते हुए कहा कि यह मंच परंपरागत कृषि ज्ञान और आधुनिक तकनीक के समन्वय का सशक्त उदाहरण है। कुलपति ने बताया कि विश्वविद्यालय के अनुसंधान प्रक्षेत्रों में दलहन एवं तिलहन फसलों, ग्रीष्मकालीन मूंग, उन्नत सकरकंद उत्पादन तकनीक, ड्रैगन फ्रूट एवं स्ट्रॉबेरी जैसी उच्च मूल्य फसलों के साथ-साथ स्थानीय फल बेर, आंवला और जामुन पर भी उन्नत शोध एवं प्रदर्शन किए जा रहे हैं।इन मॉडलों के माध्यम से किसानों को फसल विविधीकरण, पोषण सुरक्षा और आय वृद्धि के व्यावहारिक विकल्प उपलब्ध कराए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय संरक्षित खेती (पॉलीहाउस/नेटहाउस), एकीकृत कृषि प्रणाली (आई एफएस), कृषि वानिकी, फसल कैफेटेरिया, बीज प्रसंस्करण, मशरुम उत्पादन, मधुमक्खी पालन, पशुपालन एवं मत्स्य पालन इकाइयों जैसी अत्याधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित है, जहाँ किसानों को सजीव प्रदर्शन एवं प्रशिक्षण दिया जाता है। श्री अन्न उत्कृष्टता केंद्र तथा जैविक और प्राकृतिक खेती उत्कृष्टता केंद्र के माध्यम से गुणवत्ता परीक्षण, प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन की सुविधा स्थानीय स्तर पर उपलब्ध कराई जायेगी। उन्होंने किसानों, युवाओं एवं महिला उद्यमियों से विश्वविद्यालय की इन सुविधाओं का अधिकतम लाभ उठाकर आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ने का आह्वान किया। उन्होंने बताया कि मेले के अंतर्गत मिलेट प्रदर्शनी, मंडलीय फल, शाकभाजी एवं पुष्प प्रदर्शनी के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम का भी आयोजन किया जा रहा हैं।झाँसी। रानी लक्ष्मीबाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, झांसी में “विकसित कृषि-विकसित भारत @2047” विषय पर आयोजित अखिल भारतीय किसान मेला एवं कृषि प्रदर्शनी–2026 का भव्य शुभारंभ प्रदेश के कृषि, कृषि शिक्षा एवं कृषि अनुसंधान मंत्री सूर्य प्रताप शाही, प्रो. रमेश चन्द, सदस्य नीति आयोग, झाँसी-ललितपुर के सांसद अनुराग शर्मा, कुलपति डॉ. अशोक कुमार सिंह, गौ-सेवा आयोग के अध्यक्ष श्याम बिहारी गुप्ता, पंकज त्रिपाठी, निदेशक कृषि, उत्तर प्रदेश, डॉ. बीके बेहरा, मुख्य कार्यकारी अधिकारी, राष्ट्रीय मत्स्य विकास बोर्ड, तथा निदेशक प्रसार शिक्षा डॉ सुशील कुमार सिंह ने फीता काट कर किया।
उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही जी ने राष्ट्रीय महत्व की दो अत्याधुनिक प्रयोगशालाओं * “श्री अन्न उत्कृष्टता केंद्र”* एवं “जैविक और प्राकृतिक खेती उत्कृष्टता केंद्र”(कृषि उत्पाद परीक्षण प्रयोगशाला) का लोकार्पण भी किया तथा वानिकी उत्पाद कार्यशाला की आधारशिला रखी। बुंदेलखंड पैकेज, उत्तर प्रदेश सरकार एवं नीति आयोग के सहयोग से स्थापित ये प्रयोगशालाएँ अब क्षेत्र के किसानों को स्थानीय स्तर पर ही उत्पादों की वैज्ञानिक गुणवत्ता जाँच, परीक्षण एवं प्रमाणन की सुविधा प्रदान करेंगी।कृषि मंत्री श्री सूर्य प्रताप शाही जी ने अपने ओजस्वी संबोधन में कहा कि झाँसी की यह वीरभूमि, जहाँ से रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों को झुकने पर मजबूर किया, आज विकसित भारत @2047 के संकल्प की नई चेतना जगा रही है। उन्होंने “जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान” का मंत्र देते हुए कहा कि कृषि शोध को प्रयोगशालाओं से निकालकर सीधे किसानों के खेत तक पहुँचाना ही हमारी प्राथमिकता है। उत्तर प्रदेश जनसंख्या में भी बड़ा है और खाद्यान्न उत्पादन में भी बड़ा है। देश का लगभग 30% गेहूँ उत्तर प्रदेश में पैदा होता है। उन्होंने कहा कि फसल चक्र अपनाकर, बीज शोधन कर और नई तकनीकों से खेती करने पर ही आत्मनिर्भर भारत का 2047 का संकल्प पूर्ण होगा। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के तहत बुंदेलखंड के 7 जनपदों के किसानों को प्रतिवर्ष 6000 की सहायता सीधे मिल रही है। उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश का कृषि बजट पहले से कई गुना अधिक हो गया है उन्होंने बताया कि 90,000 से अधिक सोलर पंप लगाए गए हैं। तिलहन के 8 लाख से अधिक और अन्य फसलों के 6 लाख से अधिक बीज की मिनी किट वितरित किए गए हैं। झांसी में तिलहन एवं दलहन की 20,000 मिनी किट उपलब्ध कराई हैं। तथा धान की 60 लाख मीट्रिक टन खरीद कर पूर्ण भुगतान किया गया है। मसूर और चना के एमएसपी में उल्लेखनीय वृद्धि कर किसानों को मजबूत आधार दिया गया है। श्री अन्न पुनरुद्धार योजना के अंतर्गत एक लाख किसानों को निशुल्क मिनी किट दिया हुआ है। हमारी सरकार में 40,000 हेक्टेयर जमीन पर सिंचाई सुविधा बढ़ी है खरीफ सीजन में विकसित कृषि अभियान के अंतर्गत 18000 ग्रामों में वैज्ञानिकों ने जाकर किसानों से खेती पर सीधा संवाद किया है।
उन्होंने बुंदेलखंड में निःशुल्क दलहन मिनी किट, खेत तालाब, सोलर फेंसिंग, 12 माह सिंचाई सुविधा, मिलेट पुनरुद्धार योजना, बीज उत्पादन पर प्रोत्साहन, तथा प्राकृतिक खेती और जैविक खाद को बढ़ावा देने की योजनाओं का उल्लेख किया। कृषि विश्वविद्यालय द्वारा 200 एकड़ में विकसित मॉडल फार्म, हाई-टेक पॉलीहाउस, ग्रीष्मकालीन मक्का, चिया सीड्स, क्विनोआ के उत्पादन तथा नवाचारों की सराहना करते हुए कहा कि यह संस्थान बुंदेलखंड की तकदीर बदलने का केंद्र है। उन्होंने किसानों से संगठित खेती, पशुपालन, दुग्ध, तिलहन, दलहन, मधुमक्खी व मत्स्य पालन को एकीकृत मॉडल के रूप में अपनाने का आह्वान किया।विश्वविद्यालय में आज मैंने राष्ट्रीय महत्व की दो अत्याधुनिक प्रयोगशालाओं का उद्घाटन भी किया है इन प्रयोगशालाओं के माध्यम से न केवल जैविक और प्राकृतिक खेती को मजबूती मिलेगी, बल्कि मोटे अनाजों श्री अन्न की खेती का रकबा भी बढ़ेगा।इससे किसानों को गुणवत्तापूर्ण उत्पादन, बेहतर बाजार और अधिक आय का सीधा लाभ मिलेगा। कार्यक्रम में उन्होंने उपस्थित किसानों सुनीता गौरी, प्रताप नारायण दुबे, रुद्र प्रताप सिंह गौर, जगतपाल मिश्रा आदि की समस्याएँ सुनकर समाधान हेतु अधिकारियों को निर्देश भी दिए। अंत में उन्होंने कहा कि वर्तमान सरकार किसानों के स्वाभिमान, समृद्धि और आत्मनिर्भर कृषि के लिए पूर्णतः प्रतिबद्ध है, और उत्तर प्रदेश इस कृषि परिवर्तन का नेतृत्व करेगा।
प्रो. रमेश चंद, सदस्य, नीति आयोग* ने अपने संबोधन में कहा कि भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने में कृषि क्षेत्र की उत्पादकता, विविधीकरण और मूल्य संवर्धन की केंद्रीय भूमिका होगी। उन्होंने जोर दिया कि किसानों को केवल उत्पादन तक सीमित न रहकर प्रसंस्करण, ब्रांडिंग और बाजार से सीधा जुड़ाव स्थापित करना होगा। उन्होंने “लैब टू लैंड” की अवधारणा पर बल देते हुए कहा कि वैज्ञानिक अनुसंधान का लाभ सीधे खेत तक पहुँचना चाहिए और गुणवत्तापूर्ण बीजों में निवेश ही उच्च उत्पादकता की आधारशिला है। प्रो. चंद ने बताया कि भारत में कृषि विकास दर लगभग 4.6% है, जबकि उत्तर प्रदेश में यह 5% से अधिक है, जो देश को वैश्विक स्तर पर कृषि वृद्धि में अग्रणी बनाता है। उन्होंने कहा कि आज 56% बीमारियाँ असंतुलित एवं असुरक्षित भोजन से जुड़ी हैं, इसलिए पोषण-संवेदनशील खेती, श्री अन्न (मिलेट्स), दलहन एवं तिलहन का उत्पादन समय की मांग है। उन्होंने बढ़ते न्यूनतम समर्थन मूल्य को किसानों के हित में सकारात्मक कदम बताते हुए कहा कि गुणवत्ता परीक्षण, प्रमाणन और उत्कृष्टता केंद्रों की स्थापना से किसानों की आय वृद्धि, निर्यात संभावनाएँ और कृषि की समग्र मजबूती सुनिश्चित होगी। सांसद अनुराग शर्मा* ने अपने प्रेरक संबोधन में कहा कि उत्तर प्रदेश में तिलहन, दलहन, दुग्ध, सब्जी एवं मोरिंगा उत्पादन के क्षेत्र में ऐतिहासिक सौगातें दी गई हैं, जिनसे बुंदेलखंड के किसान नई संभावनाओं के साथ आगे बढ़ रहे हैं। उन्होंने स्मरण कराया कि रानी लक्ष्मीबाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के उद्घाटन अवसर पर प्रधानमंत्री जी ने “जय किसान, जय जवान, जय अनुसंधान” का मंत्र दिया था, जो आज आत्मनिर्भर भारत की आधारशिला है।
उन्होंने कहा कि देश की आत्मा गाँवों में बसती है और किसान केवल अन्नदाता ही नहीं, बल्कि ऊर्जा दाता भी बन सकते हैं। सरकार द्वारा गोबर गैस एवं बायो-ऊर्जा के लिए बढ़ाया गया बजट इसका प्रमाण है।उन्होंने आह्वान किया कि बुंदेलखंड के किसान विश्वविद्यालय से निरंतर जुड़कर वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाएँ, उत्पादन बढ़ाएँ और क्षेत्र को कृषि नवाचार का अग्रणी मॉडल बनाएं। अध्यक्ष गौ सेवा आयोग उत्तर प्रदेश श्याम बिहारी गुप्ता* ने कहा कि कृषि और गौ-संवर्धन एक-दूसरे के पूरक हैं। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक खेती, जैविक खाद, गोबर गैस और पंचगव्य आधारित कृषि प्रणाली से किसानों की लागत घटेगी और भूमि की उर्वरता बढ़ेगी। श्री गुप्ता ने किसानों से आह्वान किया कि वे गौ-आधारित समेकित कृषि मॉडल अपनाकर आत्मनिर्भर बनें और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त करें। साथ ही कहा कि विश्वविद्यालय के सजीव कृषि तकनीकी प्रदर्शन, कृषि यंत्र प्रदर्शन, प्रक्षेत्र भ्रमण, पशु प्रदर्शनी तथा किसान-वैज्ञानिक गोष्ठियाँ किसानों को व्यवहारिक ज्ञान प्रदान करेंगी।
कुलपति प्रो अशोक कुमार सिंह ने कहा कि “विकसित कृषि–विकसित भारत @2047” का लक्ष्य वैज्ञानिक अनुसंधान, नवाचार और किसानों की सक्रिय भागीदारी से ही साकार होगा। उन्होंने इस किसान मेले को किसानों, उद्यमियों एवं वैज्ञानिकों का संगम बताते हुए कहा कि यह मंच परंपरागत कृषि ज्ञान और आधुनिक तकनीक के समन्वय का सशक्त उदाहरण है। कुलपति ने बताया कि विश्वविद्यालय के अनुसंधान प्रक्षेत्रों में दलहन एवं तिलहन फसलों, ग्रीष्मकालीन मूंग, उन्नत सकरकंद उत्पादन तकनीक, ड्रैगन फ्रूट एवं स्ट्रॉबेरी जैसी उच्च मूल्य फसलों के साथ-साथ स्थानीय फल बेर, आंवला और जामुन पर भी उन्नत शोध एवं प्रदर्शन किए जा रहे हैं।

इन मॉडलों के माध्यम से किसानों को फसल विविधीकरण, पोषण सुरक्षा और आय वृद्धि के व्यावहारिक विकल्प उपलब्ध कराए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय संरक्षित खेती (पॉलीहाउस/नेटहाउस), एकीकृत कृषि प्रणाली (आई एफएस), कृषि वानिकी, फसल कैफेटेरिया, बीज प्रसंस्करण, मशरुम उत्पादन, मधुमक्खी पालन, पशुपालन एवं मत्स्य पालन इकाइयों जैसी अत्याधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित है, जहाँ किसानों को सजीव प्रदर्शन एवं प्रशिक्षण दिया जाता है। श्री अन्न उत्कृष्टता केंद्र तथा जैविक और प्राकृतिक खेती उत्कृष्टता केंद्र के माध्यम से गुणवत्ता परीक्षण, प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन की सुविधा स्थानीय स्तर पर उपलब्ध कराई जायेगी। उन्होंने किसानों, युवाओं एवं महिला उद्यमियों से विश्वविद्यालय की इन सुविधाओं का अधिकतम लाभ उठाकर आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ने का आह्वान किया। उन्होंने बताया कि मेले के अंतर्गत मिलेट प्रदर्शनी, मंडलीय फल, शाकभाजी एवं पुष्प प्रदर्शनी के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम का भी आयोजन किया जा रहा हैं।
