झाँसी।* रानी लक्ष्मीबाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, झाँसी में आयोजित अखिल भारतीय किसान मेला एवं कृषि प्रदर्शनी–2026 के अंतर्गत 15 फरवरी रविवार को विश्वविद्यालय एवं दीनदयाल शोध संस्थान का संयुक्त सत्र गरिमामय वातावरण में संपन्न हुआ। कुलपति प्रो. अशोक कुमार सिंह, दीनदयाल शोध संस्थान के संगठन सचिव अभय महाजन, भारतीय किसान संघ के अखिल भारतीय संगठन मंत्री दिनेश कुलकर्णी, संस्थान के कोषाध्यक्ष बसंत पंडित, भारतीय किसान संघ के डॉ. एसके दुबे तथा निदेशक शोध डॉ. एसके चतुर्वेदी की गरिमामयी उपस्थिति रही।
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कुलपति प्रो. अशोक कुमार सिंह ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि किसान मेला केवल प्रदर्शनी नहीं, बल्कि सीखने और नवाचार अपनाने का प्रभावी मंच है। उन्होंने किसानों से सभी स्टॉलों का अवलोकन कर विश्वविद्यालय की उन्नत तकनीकों और देशभर से आए नवाचारों को समझकर अपनाने का आह्वान किया।

उन्होंने पॉलीहाउस में गोभी, टमाटर एवं खीरा की वैज्ञानिक खेती, एकीकृत कृषि प्रणाली, मशरूम उत्पादन, मधुमक्खी पालन तथा चना एवं सरसों की उन्नत खेती के मॉडलों को देखने और अपने खेतों में लागू करने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि परंपरागत ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के समन्वय से ही कृषि को लाभकारी बनाया जा सकता है।

कुलपति ने बताया कि देश को आज भी लगभग 50 लाख टन दलहन आयात करना पड़ता है, ऐसे में दलहन एवं तिलहन में आत्मनिर्भरता समय की मांग है।
दीनदयाल शोध संस्थान के संगठन सचिव अभय महाजन ने कहा कि भारत की कृषि परंपरा सदियों तक बिना रासायनिक खाद के समृद्ध रही है। उन्होंने किसानों को प्रेरित करते हुए कहा कि स्वाभिमान और स्वावलंबन ही आत्मनिर्भर कृषि का आधार है।
उन्होंने प्राकृतिक खेती का मॉडल एक एकड़ से प्रारंभ कर धीरे-धीरे विस्तार करने की सलाह दी और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण पर बल दिया।

2026 किसान महिला वर्ष: कृषि पुनर्जागरण का प्रतीक
भारतीय किसान संघ के अखिल भारतीय संगठन मंत्री दिनेश कुलकर्णी ने कहा कि वर्ष 2026 को किसान महिला वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है, जो कृषि सम्मान का प्रतीक है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि विकसित भारत @2047 का संकल्प अवश्य साकार होगा और कृषि इसकी आधारशिला बनेगी।

दीनदयाल शोध संस्थान के कोषाध्यक्ष बसंत पंडित ने फसल विविधीकरण पर जोर देते हुए कहा कि केवल धान-गेहूँ से बुंदेलखंड का विकास संभव नहीं। उन्होंने बताया कि सतना जिले में सरसों की खेती का रकबा 33,000 हेक्टेयर तक पहुँचना विविधीकरण का सफल उदाहरण है।
उन्होंने केन-बेतवा लिंक परियोजना से बुंदेलखंड में सिंचाई की समस्या कम होने की उम्मीद जताई।
एक नई तकनीक अपनाने का आह्वान

भारतीय किसान संघ के डॉ. एसके दुबे ने किसानों से आग्रह किया कि वे मेले से कम से कम एक नई तकनीक अपनाकर जाएँ। उन्होंने आधा एकड़ भूमि पर जैविक खेती व जैविक चारा उत्पादन शुरू करने की सलाह दी।
प्रगतिशील किसानों ने साझा किए अनुभव*

पद्मश्री एवं अन्य सम्मानित कृषकों— सेठपाल सिंह सहारनपुर, श्रीमती कृष्णा यादव बुलंदशहर, चंद्रशेखर सिंह बनारस, लक्ष्मी नारायण चतुर्वेदी जालौन, अवधेश प्रताप सिंह ‘लल्ला’जालौन, अशोक सिंह मंडोरी एवं कवल सिंह चौहान सोनीपत हरियाणा ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि नवाचार, वैज्ञानिक मार्गदर्शन और परिश्रम सफलता की कुंजी हैं।

उन्होंने सिंघाड़ा की वैज्ञानिक खेती, जैविक एवं प्राकृतिक खेती, चंदन की व्यावसायिक संभावनाएँ, मल्टी क्रॉपिंग मॉडल, बीज उत्पादन, मशरूम, नेपियर घास, सहजन उत्पादन तथा अचार एवं प्रसंस्कृत उत्पादों के माध्यम से मूल्य संवर्धन जैसे विविध आय स्रोतों पर प्रकाश डाला।
हितधारकों का प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित*

द्वितीय एवं तृतीय सत्रों में चारा फसलें, प्राकृतिक खेती, दलहन-तिलहन, बीजोत्पादन, पशुपालन, मत्स्य पालन, मधुमक्खी पालन, संरक्षित खेती एवं कृषि वानिकी पर विस्तृत प्रशिक्षण दिया गया। विश्वविद्यालय के विभिन्न अधिष्ठाताओं एवं विशेषज्ञों ने किसानों को व्यावहारिक जानकारी प्रदान की।
कार्यक्रम का स्वागत संबोधन निदेशक शोध डॉ. एसके. चतुर्वेदी ने किया।
किसान मेला 2026 का यह संयुक्त सत्र आत्मनिर्भर कृषि, प्राकृतिक खेती और विकसित भारत @2047 के संकल्प को नई दिशा देने वाला सिद्ध हुआ।
संचालन डॉ आशुतोष शर्मा ने एवं सभी का आभार डॉ गौरव शर्मा ने व्यक्त किया।
